बीमा पॉलिसी बेचने के लिए कंपनियां एजेंटों, बैंकों, ब्रोकरों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को कमीशन देती हैं। इस व्यवस्था में कमीशन कितना हो, किस उत्पाद पर कितना भुगतान उचित है और क्या ज्यादा कमीशन पाने की होड़ में ग्राहक को उसकी जरूरत से अलग पॉलिसी बेची जा सकती है—इन सवालों पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने नए सिरे से विचार शुरू किया है।
भारतीय रेलवे ने पीआरएस काउंटरों से टिकट लेने वाले यात्रियों के लिए वैकल्पिक यात्रा बीमा योजना (OTIS) शुरू कर दी है। अब मात्र 45 पैसे के प्रीमियम में 10 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलेगा।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।
अगर आपकी गाड़ी का इंश्योरेंस खत्म हो चुका है, तो निकट भविष्य में आपको पेट्रोल पंप से ईंधन मिलना बंद हो सकता है। सड़कों पर बिना बीमा दौड़ते वाहनों की गंभीर समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना इंश्योरेंस वाली गाड़ियों के चालान काटे जाएं और उन्हें फ्यूल न देने का नियम लागू किया जाए।
सरकार ने LIC में ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए 6.5% हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है। इसके लिए फ्लोर प्राइस 382 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है। जानिए इससे जुड़ी सभी खास बातें, शेयर बाजार पर असर और पूरी डिटेल।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम के केस में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दुर्घटना दावों में मुआवजा तय करते समय केवल आधार कार्ड में दर्ज उम्र को ही आयु का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।
बीमा कंपनियां शुरू में बड़े-बड़े और लुभावने आफर देकर ग्राहक बनाती हैं फिर अगर कोई हादसा हो जाए तो उपभोक्ता के परिजनों को क्लेम के लिए चक्कर लगवाती हैं। या फिर मुआवजा राशि देने से मुकर जाती हैं। इससे पीड़ित अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
देशभर में प्रतिदिन लाखों की संख्या में सड़क हादसे होते हैं। जहां हादसे के शिकार लोगों की जिंदगियां तक तबाह हो जाती हैं। लेकिन अनदेखी और उदासीनता का आलम यह है कि करोड़ों वाहन ऐसे दौड़ रहे हैं जिनके पास जरूरी बीमा तक नहीं है। यह हम नहीं, बल्कि केंद्र सरकार ने खुद सदन में स्वीकार किया है।




















