चित्रकूट विधानसभा के आदिवासी गांवों को जोड़ने वाली 40 लाख की सड़क निर्माण योजना सवालों में है। घटिया निर्माण के कारण सड़क उखड़ गई, बारिश में दलदल बनता है और ग्रामीण आज भी कठिन रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
चित्रकूट विधानसभा के घने जंगलों में बसे आदिवासी गांव बिछियन, तांगी और करारिया आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी फाइलों में इन गांवों को सड़क सुविधा से जोड़ने का दावा जरूर किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद ग्रामीण आज भी वर्षों पुराने कच्चे ढर्रे पर चलने को मजबूर हैं।
मझगवां विकासखंड अंतर्गत खोडरी और मझगवां ग्राम पंचायतों के माध्यम से लगभग 3.8 किलोमीटर लंबी सड़क निर्माण के लिए 40 लाख रुपए खर्च किए गए। दावा किया गया कि इस सड़क के बनने से आदिवासी ग्रामीणों की 25 से 30 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी कम हो जाएगी। लेकिन सड़क निर्माण की गुणवत्ता ऐसी रही कि कुछ ही समय में पूरी सड़क उखड़ने लगी और अब यह मार्ग दुर्घटना का कारण बनता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में भारी अनियमितता हुई। सड़क के नाम पर सिर्फ मिट्टी डाल दी गई, जबकि दो जगह बनाई गई पुलियाओं में भी मजबूत निर्माण के बजाय केवल ढोले रखकर ऊपर मिट्टी भर दी गई। परिणाम यह हुआ कि हल्की बारिश में ही सड़क दलदल बन जाती है और आवागमन बाधित हो जाता है।
आदिवासियों के लिए यही है मुख्य रास्ता
बिछियन, तांगी और करारिया गांवों में रहने वाले अधिकांश परिवार आदिवासी समुदाय से आते हैं। इन गांवों के लोगों के लिए मझगवां तहसील मुख्यालय ही अस्पताल, स्कूल, राशन, बाजार और प्रशासनिक कार्यों का केंद्र है। पहले ग्रामीणों को जंगल और पहाड़ी रास्तों से लंबा घुमाव लेकर मझगवां पहुंचना पड़ता था। सड़क बनने के बाद उम्मीद थी कि जीवन आसान होगा, लेकिन घटिया निर्माण ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी। ग्रामीण बताते हैं कि अब रास्ता पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है। बारिश में बाइक फिसलती हैं, मरीजों को ले जाना मुश्किल हो जाता है और कई बार लोग बीच रास्ते में फंस जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क निर्माण का लाभ सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया। गांवों में रहने वाले आदिवासियों को आज भी वही कठिन जीवन जीना पड़ रहा है, जबकि उनके नाम पर लाखों रुपए खर्च दिखाए जा चुके हैं।
वन क्षेत्र और ढलान का हवाला
यह पूरा क्षेत्र घने जंगल और बाघ बाहुल्य इलाके में आता है। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और वन विभाग की अनुमति जैसी दिक्कतों के कारण बेहतर निर्माण नहीं हो सका। यहां के एक माननीय ने भी यह स्वीकार किया कि सड़क गुणवत्ताहीन बनी है। उन्होंने कहा कि यह सड़क वर्ष 2017 में उनके प्रयासों से स्वीकृत हुई थी, लेकिन क्षेत्र की खड़ी ढालान और वन क्षेत्र होने के कारण निर्माण में कठिनाइयां आईं। हालांकि ग्रामीणों का सवाल है कि यदि निर्माण की परिस्थितियां इतनी कठिन थीं तो गुणवत्ता से समझौता क्यों किया गया। क्या तकनीकी परीक्षण हुआ था? क्या निर्माण एजेंसी पर निगरानी रखी गई? और यदि सड़क टिकाऊ नहीं बन सकती थी तो फिर करोड़ों की योजनाओं की तरह यहां भी बजट क्यों खर्च किया गया?
यह पूरा क्षेत्र घने जंगल और बाघ बाहुल्य इलाके में आता है। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और वन विभाग की अनुमति जैसी दिक्कतों के कारण बेहतर निर्माण नहीं हो सका। यहां के एक माननीय ने भी यह स्वीकार किया कि सड़क गुणवत्ताहीन बनी है। उन्होंने कहा कि यह सड़क वर्ष 2017 में उनके प्रयासों से स्वीकृत हुई थी, लेकिन क्षेत्र की खड़ी ढालान और वन क्षेत्र होने के कारण निर्माण में कठिनाइयां आईं। हालांकि ग्रामीणों का सवाल है कि यदि निर्माण की परिस्थितियां इतनी कठिन थीं तो गुणवत्ता से समझौता क्यों किया गया। क्या तकनीकी परीक्षण हुआ था? क्या निर्माण एजेंसी पर निगरानी रखी गई? और यदि सड़क टिकाऊ नहीं बन सकती थी तो फिर करोड़ों की योजनाओं की तरह यहां भी बजट क्यों खर्च किया गया?
दो पंचायतों से निकले 40 लाख, काम नजर नहीं आया
जानकारी के अनुसार सड़क निर्माण के लिए खोडरी ग्राम पंचायत से 20 लाख रुपए और मझगवां पंचायत से 20 लाख रुपए खर्च किए गए। खोडरी पंचायत की ओर से बिछियन से दूसरी पुलिया तक सड़क बनाई गई, जबकि वहां से मझगवां तक का हिस्सा दूसरी पंचायत द्वारा तैयार कराया गया। लेकिन जमीनी हालात देखकर ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि आखिर 40 लाख रुपए खर्च कहां हुए। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की हालत देखकर यह विश्वास करना मुश्किल है कि इतनी बड़ी राशि वास्तव में निर्माण पर लगी होगी। कई लोगों का दावा है कि दस लाख रुपए का भी काम मौके पर दिखाई नहीं देता
153 नई सड़कों पर भी उठने लगे सवाल
चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान में 153 नई सड़कों की स्वीकृति दी गई है। इनमें 105 सड़कें ग्राम पंचायतों को जोड़ने और 48 सड़कें वार्ड एवं मोहल्लों के लिए प्रस्तावित हैं। ऐसे में बिछियन-मझगवां सड़क का मामला आने वाले निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ा रहा है। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकतार्ओं का कहना है कि यदि समय रहते निगरानी और जवाबदेही तय नहीं हुई तो नई परियोजनाएं भी भ्रष्टाचार का शिकार हो सकती हैं। जिम्मेदारों ने कही जांच की बात ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के ईई ने कहा कि सड़क की गुणवत्ता को लेकर जानकारी सामने आई है। मामले की जांच कर संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। हालांकि ग्रामीणों को अब सिर्फ जांच के आश्वासन पर भरोसा नहीं रह गया है। उनका कहना है कि वर्षों से खराब सड़क झेल रहे लोगों को अब कार्रवाई नहीं, बल्कि टिकाऊ सड़क चाहिए।

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