सतना-मैहर में 388 मरम्मत योग्य हैंडपंप अब तक बंद हैं, जिससे जल संकट गहराता जा रहा है। ग्रामीणों को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
गर्मी की शुरूआत के साथ ही सतना और मैहर जिले में पेयजल संकट की तस्वीर साफ नजर आने लगी है, लेकिन इस बार सवाल सिर्फ जलस्तर गिरने का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि दोनों जिलों में कुल 25 हजार 5 सौ 69 हैंडपंप स्थापित हैं, जिनमें से 1 हजार 899 बंद हैं। इनमें 3 सौ 88 हैंडपंप ऐसे हैं जिन्हें सामान्य मरम्मत से चालू किया जा सकता है, फिर भी ये अब तक बंद पड़े हैं।
जिलेवार स्थिति देखें तो सतना जिले के 1 हजार 2 सौ 2 गांवों में 16 हजार 83 हैंडपंप हैं। इनमें से 1हजार 437 बंद हैं। 1 हजार हैंडपंप जलस्तर गिरने से बंद हुए हैं, लेकिन 272 हैंडपंप ऐसे हैं जिन्हें मरम्मत से चालू किया जा सकता है। इसके बावजूद इन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह मैहर जिले के 5 सौ 61 गांवों में 9 हजार 4 सौ 86 हैंडपंप स्थापित हैं। यहां 4 सौ 62 हैंडपंप बंद हैं, जिनमें से 3 सौ 2 जलस्तर गिरने से प्रभावित हैं। लेकिन 1 सौ 16 हैंडपंप ऐसे हैं जिन्हें मामूली सुधार से चालू किया जा सकता है, फिर भी ये अब तक बंद पड़े हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कुल 388 हैंडपंप आसानी से चालू किए जा सकते हैं, तो फिर ये अभी तक क्यों बंद हैं? क्या मरम्मत के लिए बजट की कमी है, या फिर निगरानी और जवाबदेही में कमी?
गांव में बिगड़ी व्यवस्था
ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर महीनों से हैंडपंप खराब पड़े हैं, लेकिन शिकायत के बाद भी सुधार नहीं किया गया। जमीनी हकीकत यह है कि जिन गांवों में एक-दो हैंडपंप ही पानी का सहारा होते हैं, वहां इनके बंद होने से लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। महिलाएं और बच्चे दूर-दूर से पानी लाने को मजबूर हैं। कई गांवों में पानी के लिए कतारें लग रही हैं और विवाद की स्थिति भी बन रही है।
मरम्मत और मेंटेनेंस कब
जानकारों का मानना है कि मार्च में ही इस तरह के हालात बनना प्रशासनिक तैयारी पर सवाल खड़े करता है। हर साल गर्मी से पहले हैंडपंपों की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम किया जाना चाहिए, लेकिन इस बार यह व्यवस्था कमजोर नजर आ रही है। प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है एक ओर जलस्तर गिरने से बंद हो रहे हैंडपंप, दूसरी ओर मरम्मत योग्य संसाधनों का समय पर उपयोग न होना। यदि इन 388 हैंडपंपों को जल्द चालू नहीं किया गया, तो आने वाले महीनों में जल संकट और गहरा सकता है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इन सवालों का जवाब कैसे देता है और जमीनी स्तर पर राहत पहुंचाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
पत्थर तोड़ने वालों के हिस्से प्यास
सतना के मैहर बायपास किनारे बसी बस्ती में इंसान नहीं, मानो प्यास रह रही है। करीब 800 लोग एक हैंडपंप पर टूट पड़ते हैं। पानी के लिए लाइन नहीं, रोज झगड़े लगते हैं। तीन पीढ़ियों से पत्थर तोड़कर पेट पालने वाले इन परिवारों को आज तक पीने का पानी नसीब नहीं हुआ। विडंबना देखिए, घर बनाकर नल की फिटिंग तो कर दी गई, लेकिन सप्लाई लाइन जोड़ने की फुर्सत किसी को नहीं मिली। लोग बार-बार आवेदन देते रहे, यहां तक कि कनेक्शन का पैसा देने को भी तैयार हैं, फिर भी जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। हैंडपंप खराब हुआ तो हालात और बदतर महिलाएं और बच्चे दूर-दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। गर्मी आते ही यह संकट विकराल रूप लेने वाला है। ऊपर से गंदगी का अंबार, सफाई नदारद बीमारियों का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। सवाल साफ है स्मार्ट सिटी के दावों के बीच आखिर ये बस्ती किस जमाने में जी रही है? प्रशासन की चुप्पी अब संवेदनहीनता की हद पार कर चुकी है।


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