साप्ताहिक कॉलम


मध्यप्रदेश भाजपा ने बड़े यत्न से 'संस्कार पाठशाला' चलाई थी, उम्मीद थी कि माननीयों की बेलगाम ज़ुबान पर लगाम लगेगी, और जो बोल बचन पार्टी की छवि बिगाड़ते हैं, उन पर ब्रेक लगेगा। लेकिन ट्रेनिंग के ठीक एक महीने बाद ही कुछ माननीय ऐसे पुराने ढर्रे पर लौटे कि लगा जैसे पाठशाला में सिर्फ हाजिरी दी थी, पाठ तो एग्ज़ाम सेंटर तक पहुँचने से पहले ही उड़नछू हो गया! हैरानी की बात ये कि जो ज़ुबान अब फिसल रही है, वो उन 'वरिष्ठ' मंत्रियों की है, जो खुद को अनुभवी नेताओं की कैटेगरी में गिनते हैं। कई बार सांसद रह चुके हैं, और अब मप्र की काबीना में हैवीवेट पोर्टफोलियो भी संभाल रहे हैं। सड़कों के गढ्डे को लेकर दिए बयान में ऐसे जुबान ऐसी चली कि रायता ही फैल गया। रही सही कसर विंध्य के एक नवोदित सांसद ने पूरी कर दी। उन्होंने भी जनता की मांग का तमाशा बना डाला। जनता सकते में, पार्टी के चेहरे पर शिकन, और विरोधी खेमा ताली बजा-बजा कर मज़े ले रहा है। भीतरखाने अब चर्चाएं गर्म हैं कि आख़िर कौन-सा आयुर्वेदिक नुस्खा अपनाएं कि माननीयों की ज़ुबान फिसले भी नहीं, और भटके भी नहीं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम में यूं तो दर्जनों मंत्री हैं, कई पुराने और कुछ नए भी, दौरे पुराने भी करते हैं और नए भी, लेकिन एक केंद्रीय मंत्री जी की बात ही निराली है। वो अभी भी पुराने ही भाव में है जब पूरा प्रदेश उनका हुआ करता था। लेकिन पार्टी ने उनकी प्रतिभा को देख प्रदेश से बाहर अब देश सेवा का मौका दिया है, पर मिजाज और शानो-शौकत वही प्रदेश वाली बनी हुई है.. मंत्री जी जहां भी जाते हैं, उनकी अर्धांगिनी साथ-साथ जाती हैं। दौरा निजी हो तो समझ में आता है, संसदीय क्षेत्र का हो तो भी तर्क बनता है। लेकिन यदि सरकारी दौरा वो भी भारत भ्रमण वाला हो और उसमें भी मंत्री महोदय अकेले न जाकर पारिवारिक उपस्थिति दर्ज कराएं, तो फिर सवाल उठना लाज़मी है। अब मंत्रालयी गलियारों में कानाफूसी है कि "क्या सरकारी दौरे का स्वरूप बदल गया है?""किस नियम में यह प्रावधान है कि मंत्रीजी के साथ उनके परिजन भी हर मंच और हर समीक्षा यात्रा में रहें?" कुछ अधिकारी दबी जुबान में कह रहे हैं "यदि सरकारी दौरे व्यक्तिगत संग-साथ के मंच बन जाएं, तो फिर सरकारी प्रोटोकॉल की सीमाएं किसके लिए हैं?"और विपक्षी खेमे से यह भी फुसफुसाहट है " इस तरह से सरकारी संसाधनों का उपयोग अब निजीकृत भावना से किया जाएगा?" अधिकारी भी पूछ रहे हैं क्या यह छूट सरकारी दौरों पर उनको भी परिवार साथ लेकर जाने के लिए मिलेगी।

मध्यप्रदेश में मैदानी अधिकारियों का बड़ा प्रशासनिक फेरबदल घोषणाओं की लिस्ट में है, आदेशों की नहीं! पिछले दिनों एक प्रतीक्षित सूची आई भी, लेकिन उसमें सिर्फ मंत्रालय के उच्चाधिकारियों के नाम टंगे थे। मैदानी अफसरों की सांसें अब भी फाइलों में फंसी हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय के चौथे माले पर लगी ब्रेक की ताकत इतनी जबरदस्त है कि दो बार भेजी गई जंबो लिस्ट भी “एक बार में इतने नहीं” कहकर वापस कर दी गई। अब मैदानी अधिकारी गिनती का गणित लगाने में व्यस्त हैं “सूची को कितना छोटा करें कि साहब की प्राथमिकता में फिट बैठे?” कुछ अधिकारी तो अब ग़लतफहमी में हैं कि फेरबदल की सूची बन रही है या कक्षा दो के छात्रों की हाजिरी! सवाल यह नहीं कि सूची लंबी है या छोटी, सवाल यह है कि नियमों की मंशा तय होगी या मिज़ाज से चलेगा प्रशासन?

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली एक जांच एजेंसी ने स्वास्थ्य विभाग के एक रिटायर्ड कर्मचारी पर अकूत संपत्ति के आरोप में जब छापामार कार्रवाई की, तो कागजों के साथ-साथ गाड़ियों की कतारें भी बरामद हो गईं। माना गया कि मामला बड़ा है, जांच भी बड़ी होगी। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि निजाम साहब का सुर ही बदल गया। और जब निजाम साहब तबादले की मार से एजेंसी से हटाकर मूल विभाग में एक कोने में कर दिए गए। तब दबी जुबान में चर्चा शुरू हो गई कि जैसे आबकारी अधिकारी के छापे में एजेंसी ने ‘केस को कमजोर’ करने की कोशिश की थी, कुछ वैसा ही सैंपल टेस्टिंग इस मामले में भी हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना कि इस बार कोई तिरछी नजर रोकने सामने नहीं आई। अंदरखाने से खबर है कि साहब ने बेनामी इनोवा को बड़ी सफाई से अपने नाम की पार्किंग में उतार लिया और सौदा सधे हाथों से पट गया। अब ‘हेल्थ डिपार्टमेंट’ वाले की थोड़ी वेल्थ तो चली गई, लेकिन हेल्थ अभी फिट है! जांच धीमी, नीयत ढीली और फाइलों पर धूल है। बाकी सब सेटिंग में कूल है।

वैसे तो सरकारें लोक कल्याण करती ही हैं, लेकिन जब कल्याण की घड़ी भी पहले से देख ली जाए, तो समझिए राजनीति में सिर्फ नीति नहीं, घड़ी की सुई भी मायने रखती है। मध्यप्रदेश के मुखिया ने लाड़ली बहना योजना में राखी आने से पहले ही बहनों के खातों में शगुन भेजने का कह दिया है.. “भाई वही जो वक़्त से पहले बहनों का ख्याल रखे।” यह योजना तो देश के कई राज्यों में चल रही हैं, लेकिन आधी आबादी के मन को सबसे पहले किसने पढ़ा, इस सवाल का जवाब फिलहाल प्रदेश से बाहर नहीं दिखता। इस 'समयपूर्व स्नेह' का असर यह हुआ कि अब राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट है “अगर नए भाई ऐसे ही आगे बढ़ते रहे तो बहनों की स्मृति से पुराने रिश्ते धुंधले न पड़ जाएं...वो पुराने भाई, जो कभी मामा कहलाना पसंद करते थे।”

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मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। निर्माण विभाग की वेबसाइट से संपत्ति का ब्योरा गायब, दो संभागों में अफसरों की तनातनी और अन्य चर्चित मामले विस्तार से पढ़ें।
ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।