सुप्रीम कोर्ट ने देश में मृत्युदंड देने के लिए फांसी के बजाय किसी कम दर्दनाक विकल्प-जैसे जहरीला इंजेक्शन या गोली मारने को अपनाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने से भविष्य में इस मुद्दे पर वैधानिक व वैज्ञानिक जांच का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता।

फांसी की सजा की संवैधानिक वैधता बरकरार
फांसी के जरिए सजा-ए-मौत का प्रावधान सही
जहरीला इंजेक्शन को अपनाने से किया इंकार
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट ने देश में मृत्युदंड देने के लिए फांसी के बजाय किसी कम दर्दनाक विकल्प-जैसे जहरीला इंजेक्शन या गोली मारने को अपनाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए साफ किया कि भारत में सजा-ए-मौत के लिए फांसी की प्रक्रिया ही लागू रहेगी। अदालत ने इस विषय पर पूर्व में दिए गए तीन प्रमुख फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की याचिकाकर्ता की मांग को भी अनुचित मानते हुए खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता के तर्क
वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर इस जनहित याचिका में फांसी की प्रक्रिया को अत्यधिक दर्दनाक, क्रूर और अमानवीय बताया गया था। फांसी के बाद व्यक्ति को मृत घोषित करने में लगभग 40 मिनट लगते हैं, जबकि जहरीला इंजेक्शन या गोली मारने जैसे विकल्पों में मौत प्रक्रिया 5 मिनट में पूरी हो जाती है।
कानूनी-संवैधानिक मांग
सीआरपीसी की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'सम्मान के साथ मरने के अधिकार' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया गया। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देते हुए मांग की गई कि मृत्युदंड में न्यूनतम शारीरिक पीड़ा सुनिश्चित करने वाले तरीके अपनाए जाने चाहिए।
भविष्य में समीक्षा और केंद्र को स्वतंत्रता
शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने से भविष्य में इस मुद्दे पर वैधानिक व वैज्ञानिक जांच का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता। यदि भविष्य में कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि पुराने फैसलों के आधार बदल चुके हैं, तो अदालत इस विषय पर पुनर्विचार कर सकती है। केंद्र सरकार यदि चाहे तो मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की समिति का गठन कर सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि और केंद्र का रुख
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को बताया था कि इस विषय पर विचार के लिए समिति गठित की गई है। हालांकि, दोषियों को फांसी या जहरीले इंजेक्शन में से चुनने का विकल्प देने के सुझाव पर केंद्र ने हलफनामा देकर इसे अव्यावहारिक बताया था। शीर्ष अदालत ने 22 जनवरी को मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है।


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