सतना से उठे धान मिलिंग विवाद में 67 फीसदी नियम पर सवाल, मिलर्स के अनुसार केवल 30-32 फीसदी चावल निकल रहा, हाईकोर्ट ने 55 फीसदी राहत दी, नीति और गुणवत्ता पर बड़ा संकट सामने आया

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
सतना जिला से उठी आवाज अब पूरे प्रदेश की मिलिंग व्यवस्था पर सवाल बन चुकी है जब धान से मुश्किल से 30-32 फीसदी (जैसा की मिलर्स का दावा है) ही चावल निकल रहा है तब 67 फीसदी जमा कराने का नियम क्या जमीनी हकीकत से कटे सिस्टम की जिद नहीं? इधर, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की फटकार के बाद 55 फीसदी की राहत जरूर मिली है लेकिन असली व्सवाल अब भी कायम है गलती धान की गुणवत्ता की है या पूरी जिम्मेदारी मिलर्स पर डाल दी गई है?
धान मिलिंग को लेकर मध्य प्रदेश में नीति और वास्तविक उत्पादन के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में लागू 67 फीसदी चावल जमा करने के नियम को सतना के मिलरों ने चुनौती दी, जिस पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अंतरिम राहत देते हुए 55 फीसदी चावल जमा करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कार्पोरेशन से ट्रायल मिलिंग रिपोर्ट भी मांगी है। मध्य प्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन लिमिटेड की नीति के अनुसार मिलरों को दिए गए धान के बदले 67 फीसदी चावल जमा करना अनिवार्य है। मिलरों का कहना है कि यह लक्ष्य वर्तमान परिस्थितियों में अव्यावहारिक है क्योंकि धान की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। मिलर्स का दावा है कि 10 मार्च 2026 को सतना के करतार इंडस्ट्रीज में कराई गई ट्रायल मिलिंग के आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि समर्थन मूल्य में खरीदी गई धान की गुणवत्ता मानक स्तर की नहीं है टेस्ट मिलिंग के दौरान 21.44 क्विंटल धान से केवल 6.55 क्विंटल चावल जो लगभग 30-32 फीसदी इसके अलावा 5.32 क्विंटल खण्डा, 2.12 क्विंटल कना (ब्रान), 6.35 क्विंटल भूसी, शेष भाग मुर्गी दाना, रिजेक्शन और अन्य अपशिष्ट इसी तरह के परिणाम सतना, वैभव राइस मिल और सिवनी जिले में भी मिले हैं।
प्रति लॉट उत्पादन में भारी अंतर
मिलिंग के मानक लॉट 433 क्विंटल धान के आधार पर वास्तविक उत्पादन लगभग 151.55 क्विंटल चावल जिसमें अपेक्षित जमा 290.11 क्विंटल जिसमें कमी 138.56 क्विंटल प्रति लॉट रही यह अंतर मिलरों के लिए आर्थिक चुनौती बन गया है। यही नहीं प्रदेश में कुल धान खरीदी लगभग 4.90 करोड़ क्विंटल है। जिसमें से अनुमानित चावल उत्पादन 1.56 करोड़ क्विंटल और अनुमानित कमी 1.71 करोड़ क्विंटल। यदि इस कमी की पूर्ति बाजार से 3000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से की जाती है, तो करीब 5,132 हजार करोड़ का अतिरिक्त आर्थिक भार पैदा हो जाएगा।
टेस्ट मिलिंग पर भी सवाल
मिलरों ने धान की गुणवत्ता (टेस्ट मिलिंग)पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि वर्तमान धान से अपेक्षित रिकवरी संभव नहीं। गुणवत्ता परीक्षण में खामियां या लापरवाही हुई है। सामान्य परिस्थितियों में 67 फीसदी रिकवरी के मुकाबले अभी लगभग 32 फीसदी ही चावल मिल रहा है। जिसके चलते मिलर्स पर कवर करने के लिए सरकार दबाव बनाए रख रही है। इस चक्कर में मिलर्स को कमी की पूर्ति के लिए बाजार से चावल खरीद कर जमा करने की चुनौती है।
सरकार से मांगा मार्गदर्शन
मध्य प्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन लिमिटेड सतना जिला प्रबंधक ने मुख्यालय भोपाल को पत्र लिखकर आगे की कार्रवाई और न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब के लिए मार्गदर्शन मांगे हैं वर्तमान में याचिकाकर्ता मिलरों को डिपॉजिटर आॅर्डर जारी नहीं किए जा रहे हैं। अब यह मामला नीति निर्धारण के स्तर पर महत्वपूर्ण हो गया है। मध्य प्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन लिमिटेड द्वारा हाईकोर्ट में पेश की जाने वाली ट्रायल मिलिंग रिपोर्ट और जवाब से ही आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल, यह विवाद मिलिंग नीति, धान की गुणवत्ता और प्रशासनिक जवाबदेही तीनों पर एक साथ सवाल खड़े कर रहा है।


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