मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने अशोकनगर जिले में स्थित 200 साल पुराने श्री गणेशजी मंदिर की कृषि भूमि पर राज्य सरकार का अधिकार घोषित कर दिया है। 2006 से लंबित एक महत्वपूर्ण द्वितीय अपील में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने निचली अदालतों के आदेश पलटते हुए मंदिर की पूरी जमीन को माफी औकाफ विभाग की संपत्ति माना और पुजारी के निजी स्वामित्व के दावे को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया।
ग्वालियर। स्टार समाचार वेब
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने अशोकनगर जिले में स्थित 200 साल पुराने श्री गणेशजी मंदिर की कृषि भूमि पर राज्य सरकार का अधिकार घोषित कर दिया है। 2006 से लंबित एक महत्वपूर्ण द्वितीय अपील में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने निचली अदालतों के आदेश पलटते हुए मंदिर की पूरी जमीन को माफी औकाफ विभाग की संपत्ति माना और पुजारी के निजी स्वामित्व के दावे को खारिज कर दिया। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और पुजारी केवल उसका सेवक होता है। भूमि रिकॉर्ड में भी यह संपत्ति माफी औकाफ विभाग के नाम दर्ज है। सरकार ने स्पष्ट किया कि पुजारी का कार्य केवल पूजा-अर्चना तक सीमित है। यदि कोई पुजारी मंदिर की संपत्ति को अपनी बताता है, तो यह अनुचित है।
सरकार करेगी मंदिर का प्रबंधन
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मंदिर और उससे जुड़ी संपत्ति राज्य सरकार में निहित रहेगी। मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी और पुजारी की नियुक्ति का अधिकार भी सरकार के पास होगा। यह मामला कुल 42 हेक्टेयर कृषि भूमि से संबंधित है, जो तीन गांवों - साडीता (35.003 हेक्टेयर), नागौदखेड़ी (4.922 हेक्टेयर) और मिस्टील (2.790 हेक्टेयर) में स्थित है।
उत्तराधिकार में मिली थी जमीन
सुनवाई के दौरान पुजारी की ओर से दावा किया गया था कि मंदिर और उसकी जमीन उनके पूर्वजों को लगभग 200 वर्ष पूर्व उत्तराधिकार में मिली थी, इसलिए यह एक निजी मंदिर है। इसी आधार पर निचली अदालतों ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
ठोस प्रमाण नहीं पेश कर पाए पुजारी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि देवता एक कानूनी इकाई हैं और संपत्ति उन्हीं की होती है। पुजारी या प्रबंधक को संपत्ति के स्वामित्व का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता। पुजारी भालचंद राव ने एक पुराना लाइसेंस पेश किया था, जो नई मूर्ति स्थापना से जुड़ा था, लेकिन वे उत्तराधिकार का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए। हाईकोर्ट ने कहा कि मंदिर को निजी संपत्ति बताना देवता के हितों के खिलाफ है। उत्तराधिकार और स्वामित्व का प्रमाण न मिलने पर पुजारी का दावा खारिज कर दिया गया।


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