रीवा के संजय गांधी अस्पताल में यूपीएस बैटरियां एक्सपायर होने से वेंटिलेटर बैकअप खतरे में है। प्रबंधन की लापरवाही से गंभीर वार्डों में मरीजों की जान जोखिम में है और बड़ा हादसा होने की आशंका बनी हुई है।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र संजय गांधी अस्पताल और गांधी मेमोरियल अस्पताल की व्यवस्थाएं पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं। अस्पताल के अति संवेदनशील वार्ड, जहां मरीज जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं, वहां प्रबंधन की लापरवाही ने 'टाइम बम' फिट कर दिया है। वार्डों में लगे यूपीएस सिस्टम की बैटरियां दो साल पहले ही एक्सपायर हो चुकी हैं, जो न केवल बैकअप देने में नाकाम हैं, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी खुला निमंत्रण दे रही हैं।
इन वार्डों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा
अस्पताल के वे वार्ड जहां बिजली गुल होने पर एक सेकंड की भी देरी जानलेवा हो सकती है, वहां की स्थिति सबसे डरावनी है। गायनी ओटी एवं आईसीयू, शिशु रोग गहन चिकित्सा इकाई, मेडिसिन आईसीसीयू, सर्जरी आईसीसीयू और एसपीडब्ल्यू शामिल हैं।
वेंटिलेटर का सहारा ही हुआ 'बेसहारा'
अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, इन संवेदनशील वार्डों में वेंटिलेटर और अन्य जीवन रक्षक उपकरण यूपीएस के भरोसे चलते हैं। नियमत: बिजली कटने पर यूपीएस को कम से कम एक घंटे का बैकअप मिलना चाहिए ताकि मरीजों की सांसें न रुकें। लेकिन वास्तविकता यह है कि 180 बैटरियां अपनी मियाद पूरी कर चुकी हैं। मेंटेनेंस के अभाव में ये बैटरियां अब चार्ज नहीं होतीं, जिससे वेंटिलेटर बंद होने का खतरा हर समय बना रहता है। जानकारों की मानें तो एक्सपायर्ड बैटरियों में एसिडिक रिएक्शन तेज हो जाता है। ये कभी भी फट सकती हैं या इनमें शॉर्ट सर्किट से भीषण आग लग सकती है। इन्हें वार्डों के भीतर रखना किसी बड़े विस्फोट को दावत देने जैसा है।
निर्देशों के बाद भी फाइल पर 'ब्रेक'
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर खतरे की जानकारी प्रशासन को पहले से है। पीडब्ल्यूडी (विद्युत यांत्रिकी) ने इन बैटरियों और यूपीएस के मरम्मत एवं संधारण के लिए प्राक्कलन तैयार कर भेजा था। साधारण सभा की बैठक में डीएमई ने इस बजट को मंजूरी भी दे दी थी। इसके बावजूद मेडिकल कॉलेज के अधिष्ठाता डॉ. सुनील अग्रवाल ने अब तक इस प्राक्कलन को मंजूरी नहीं दी है। प्रबंधन की इस टालमटोल नीति ने हजारों मरीजों की जान जोखिम में डाल दी है।
कोरोना काल के बाद नहीं ली गई सुध
अस्पताल में इन बैटरियों का आखिरी मेंटेनेंस 'यश इंटरप्राइजेज' द्वारा कोरोना संक्रमण काल के दौरान किया गया था। वर्ष 2023-24 में ही इनकी समय सीमा समाप्त हो गई। पिछले दो वर्षों से बिना किसी सुरक्षा आॅडिट और मेंटेनेंस के ये बैटरियां वार्डों में रखी हुई हैं। संजय गांधी अस्पताल की यह तस्वीर सिस्टम की संवेदनहीनता को दर्शाती है। एक ओर सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जा रही है। यदि समय रहते इन 180 बैटरियों को नहीं बदला गया, तो रीवा का यह प्रतिष्ठित अस्पताल किसी बड़ी जनहानि का गवाह बन सकता है। इस संबंध में जानकारी के लिए श्यामशाह मेडिकल कॉलेज के अधिष्ठाता डॉ. सुनील अग्रवाल को फोन लगाया गया परंतु उन्होंने फोन ही रिसीव नहीं किया।
अस्पताल में डीएमई के समक्ष हुई बैठक में यह मुद्दा उठा था। डीएमई द्वारा मेंटीनेंस के निर्देश दिए गए थे। यह नहीं मालूम कि बैटरी एवं यूपीएस का मेंटीनेंस करने टेंडर लगाया गया या नहीं।
- डॉ. राहुल मिश्रा, अधीक्षक एसजीएमएच रीवा

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