सतना नगर निगम में सम्पत्ति कर वसूली के नाम पर आईडी बदलकर बकाया घटाने का गंभीर मामला सामने आया। वर्षों पुराने कर बिल आधे में निपटाने के आरोपों ने बड़े भ्रष्टाचार और जांच की मांग तेज कर दी।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
अगर सम्पत्ति कर की राशि आपकी ज्यादा है और आधा पैसा जमाकर सम्पत्ति कर के बकाया से मुक्ति पाना चाहते हैं तो घबराइए नहीं,आपके लिए नगर निगम में उसकी भी व्यवस्था है। यहां सम्पत्ति कर के बिल और उसके विरुद्ध सेटिंग का एक बड़ा खेल चल रहा है। जिसमें बकाए की राशि आधी निगम में जमा कराई जाती है। बाकी का ऊपर हिसाब कर सामने वाले को बकाए से मुक्ति दिला दी जाती है। चाहे उसके लिए उपभोक्ता की नई आईडी तैयार करनी पड़े या फिर कोई अन्य पैंतरा आजमाना पड़े। निगम के सम्पत्ति कर शाखा में पदस्थ कर्मचारियों के हाथ में जादू की ऐसी छड़ी है कि वे सम्पत्ति कर के बिल को आधे में निपटा सकते हैं। तभी तो मात्र 82 दिनों में ही निगम के जिम्मेदारों ने सम्पत्ति कर के एक बिल को 72 हजार 933 रुपए से 39 हजार 517 रुपए तक पहुंचा दिया। ऐसा कारनामा नगर निगम कार्यालय से लगे महाराणा प्रताप नगर की एक सम्पत्ति में किया गया जिसमें 2013-14 से लंबित सम्पत्ति कर का मामला एक झटके में निपट गया।
मालिक वही, आईडी बदल गई
सम्पत्ति कर जमा कराने में नगर निगम में चल रहे खेल की बात करें तो यह सारा खेल आईडी बदलकर किया जा रहा है। इस खेल में मालिक तो वही रहता है पर उसकी नई आईडी बनाकर सारा खेल खेला जा रहा है। यही महाराणा प्रताप नगर निवासी रामाऔतार गुप्ता पिता कुंज बिहारी गुप्ता के मामले में हुआ है। इनकी पुरानी सम्पत्ति कर आईडी 828/572 में सम्पत्ति कर की मांग 72 हजार 933 रुपए थी, लेकिन नई सम्पत्ति कर आईडी में इन्हीं रामाऔतार की सम्पत्ति कर की मांग 39 हजार 517 रुपए हो गई। जिस नई सम्पत्ति कर आईडी 7002926822 में रामाऔतार गुप्ता का बिल घटाया गया है। वह पुरानी आईडी में सम्पत्ति की पहचान के रूप में दर्ज है।
कोई पहला मामला नहीं
सम्पत्ति कर वसूली में डिमांड और जमा किए जाने वाले कर में बड़ा खेल चल रहा है। इस खेल का रामऔतार गुप्ता एक छोटा सा मामला है, ऐसे कई मामले हैं जिसमें सम्पत्ति कर शाखा के जिम्मेदारों द्वारा लेन-देन कर लम्बा खेल खेला गया है। ज्यादातर खेल लोक अदालत के समय प्रकरणों के निपटारे के समय हुए हैं।
बिल आधा जमा, मांग पूरी समाप्त
नगर निगम में यदि आपकी सेटिंग है, खासकर सम्पत्ति कर शाखा में तो आपका सम्पत्ति कर का बिल जितना है उसके आधे में सेट हो सकता है। जी हां... महाराणा प्रताप नगर रामाऔतार गुप्ता के मामले को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। दरअसल वार्ड क्र. 6 निवासी रामाऔतार का 2013-14 से सम्पत्ति कर का बिल बकाया था, जो 72 हजार 933 रुपए हो गया था, इसकी वसूली के लिए नगर निगम द्वारा जनवरी माह में रामऔतार को सम्पत्ति कर की डिमांग भेजता है जिसमें सम्पत्ति कर की राशि 72 हजार 933 रुपए बताई गई है। इसमें सम्पत्ति आईडी 828/572 और सम्पत्ति की पहचान 7002926822 बताई गई है लेकिन 31 मार्च को एक नई आईडी जनरेट कर मूल्यांकन वर्ष 2025-26 का बिल 39 हजार 517 रुपए के एवं 4858 रुपए की छूट देते हुए 34 हजार 867 रुपए रामऔतार गुप्ता से जमा करा लिए गए। अब सवाल यह उठता है कि जब वित्तीय वर्ष 2025-26 में 9 जनवरी 2026 को रामऔतार का बिल 72 हजार 933 रुपए था तो फिर 31 मार्च आते-आते यह बिल घटकर 39 हजार 517 रुपए कैसे हो गया?
2013-14 से बकाया था सम्पत्तिकर
नगर निगम में सम्पत्ति कर वसूली के सेटिंग के चल रहे खेल में नीचे से लेकर ऊपर तक जिम्मेदार शामिल बताए जा रहे हैं। सम्पत्ति कर वसूली के इस खेल में बिल (मांग) की सेटिंग हो रही है। बिल में इस तरह की सेटिंग का एक मामला महाराणा प्रताप नगर वार्ड क्र. 6 में सामने आया है जिसमें सामने वाले का बिल मांग के मुकाबले आधा जमा करवाया गया है, जबकि सामने वाले का 2013 -14 से सम्पत्तिकर का बिल बकाया है। निगम में इस खेल का यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें बिल में सेटिंग की गई है। ऐसे कई मामले हैं जिनमें सम्पत्ति कर की मांग कुछ और थी और सामने वाले से पैसा कुछ और जमा कराया गया है। यदि पिछले सात माह में जमा हुए सम्पत्ति कर,खासतौर पर लोक अदालतों के मामलों में जांच कराई जाए तो सम्पत्ति कर वसूली के नाम पर नगर निगम में एक बड़े घोटाले का खुलासा हो सकता है।
जीआईएस सर्वे किस लिए
शहर में कितनी सम्पत्तियां हैं इसके सर्वे के लिए करोड़ों रुपए खर्च करके जीआईएस सर्वे कराया गया था, लेकिन शहर में सम्पत्तियों के कर निर्धारण के समय इसका उपयोग नहीं हो रहा है। यदि ऐसा ईमानदारी से हो तो शहर में कई ऐसी सम्पत्तियां हैं जिनका कर निर्धारण मौजूदा स्टेÑक्चर के हिसाब से नहीं हो रहा है। आरोप तो यहां तक हैं कि किसी भी सम्पत्ति के एरिया निर्धारण करने में भी गड़बड़ी की जा रही है।
ऐसे थी बकाया राशि
वर्ष मांग संचयी शेष
2013-14 11664.00 11664.00
2016-17 4933.00 16597.00
2017-18 4933.00 21530.00
2018-19 4933.00 26463.00
2019-20 5347.00 31810.00
2020-21 5347.00 37157.00
2021-22 7413.00 44570.00
2022-23 7413.00 51983.00
2023-24 8150.00 60133.00
2024-25 8150.00 68283.00
2025-26 4650.00 72933.00

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